Verses: बचपन की सुनहरी यादें, जहाँ वक्त ठहर जाता था
- ANVANI Moments Contributor

- Jun 23
- 1 min read
Divya Nath
Pune, India
The mind needs no invitation to wander. One moment you're here, and then — the lanes of childhood, Nani's courtyard, cousins you waited for all year, ice golas, drying mangoes, the comfortable noise of a summer full house.
This poem isn't describing a memory. It's reliving it.
मन का क्या है?

उसे कोई राह कोई रास्ता नहीं,
बस यूं ही चल पड़ा है दूर कहीं।
बचपन की गलियां वही,
चेहरे पर एक मुस्कान सी आई,
दिल पर वह बदमाशी की नजर छाई।
वह घंटों इंतजार रिश्तों का,
वह इंतजार पड़ोसी के बच्चों का।
वक्त ही वक्त होता था,
दिन में कितना सारा करना होता था।
वह ताश के पत्ते, वह किताबों से भरे बस्ते,
वह सुबह की सैर, वो रिश्तों का साथ |
वह दोबारा नाश्ता, वह छूटता खाना,
वह कहकाओं के शोर,
वह डांटों की फटकार।
याद है वह आंगन में सूखते आम,
वह बर्फ के गोले बारंबार।
वह नानी का दुलार,
वह मामी का प्यार,
वह गर्मियों की छुट्टियां,
बचपन की गलियां |
आज ले चला है मन फिर वही सुनहरे द्वार पर।





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